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सोमवार, 1 अगस्त 2011

अन्तर्द्वंद

खून से रिश्ता बनता आया
क्यों रिश्तो से न खून बने ?
सम्बन्ध ही जन्मे भावना
क्यों भावनाओ से न सम्बन्ध बने ?

धर्म बनता कर्म है आया
क्यों कर्मो से न धर्म बने ?
माता से बने है भाई मगर
इन जानो में क्यों न भाई बने ?

मैं चाहता हूँ  ....

तोड़ दो सारी कुरीतियाँ 
बनाना है तुम्हे  कुछ नया
करो तुम वो जो "तुम "  ने कहा
सुनो न किसने क्या है कहा ,

मानवता से प्रेरित हो भाव सभी
न मूल्य रहें  कु-धर्मो का कोई
मानव की श्रष्टि  बना डालो
तो  फिर जाग सके दुनिया सोयी ................


 

" जीवन है एक धुप्प अँधेरा "

जीवन है एक धुप्प अँधेरा 
होता जिसका नहीं सवेरा 
हम सब है बस ओस की बूंदे 
इस जीवन के कोहरे में ,

भाग रहे है इधर उधर 
लड़ते एक दूसरे से  
मानो सभी ख़ोज रहे हो 
छुटकारा इस जीवन से ,

आँखे फाड़े देख रहे है 
क्या रखा है सम्मुख में 
फिर भी हम अनजान ही रहे 
इस प्यारे झूठे जीवन से ,

क्या सुख है और क्या दुःख है ?
है सुब कुछ हमसे परिभाषित 
जीवन बस फल है कुकर्मो का 
न की  खुशी असीमित , 

म्रत्यु हो गयी मानो मेरी 
इस जीवन को पा कर के 
रिश्ते-नाते प्रेम-घ्रणा के 
मोह्पास में फस कर के ,

जीवन तो पर्याय है दुःख का 
म्रत्यु अर्थ है सुख का 
जीवन के हर क्षण  से अच्छा 
होगा अंतिम पल इस जीवन का .....................................