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रविवार, 24 जुलाई 2011

प्रेम...........

चाहत है , की यू ही अब 
अकेले जिंदगी गुजर जाये...
ग़र तूम न, तो कोई न अब,
मेरे दरवाजे दस्तक देने आये.......................... 


प्रेम अकथनीय , अकल्पनीय अनुभूति है...प्रेम जीवन का सबसे सुखद अनुभव है , और इस एहसास से दूर भागना या एहसास करते हुए भी अभाव में जीना सबसे दुखद.................




क़ाश आज ऐसा हो जाये.............

क़ाश आज ऐसा हो जाये 
शाम गुजर जाये 
पर सुबह न  आये 
क़ाश आज ऐसा हो जाये,
मन का संशय हट जाये
और नया विश्वाश आ जाये 
कि..समय  यहीं रुक जायेगा
लक्ष्य मुझे मिल जायेगा
क़ाश आज ऐसा हो जाये,
कम्पित मन के
कल्पित भय से
मुक्ति मुझे मिल जाये
क़ाश आज ऐसा हो जाये...
क़ाश आज ऐसा हो जाये........................................  



अनचाही दरार-2........."खूंटा "

प्रेम की बनावट में 
समर्पण  की लकड़ी  के,
दो खूंटे बनाये थे हमने 
एक मैंने तेरे,
और एक तुने मेरे 
सीने में गाड़ा था ...
तेर खूंटा उखड़ न सका,
मेरा खूंटा उखड़ गया ......आधा
जड़ को लिए तू
और तेरे खूंटे को लिए मैं,
अगल बगल की विमुखी  सड़को पर...
एक दुसरे को कोसते 
 खुद की गलतियाँ दूंदते,
खूंटे में रही कमी का एहसास करते 
चले जा रहे है......
चौराहे की तलाश में,
की ताकि सड़क बदल ले 
और हो जाये फिर से हमराही,
लेकिन नहीं आ रहे है ...
चौराहे .... 
 

अनचाही दरार-1

पिछली ऋतू में मैं सूखा था,
अबकी ऋतू न आई
अगली ऋतू के इंतज़ार में ,
आँखे भर भर आई.........