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शुक्रवार, 13 मई 2011

Chaahat

कल जब सुबह होगी,
फिर उठूँगा
कुछ नया करुगा 
पर ये तो मैंने कल भी सोचा था
और शायद कल भी सोचूंगा ,
स्खलित नहीं हुई है रूह मेरी 
गहरा समंदरहै उतरने को अभी,
पर ये तो मैंने कल भी सोचा था
और शायद कल भी सोचूंगा,
कब तृप्ति मिलेगी ?
कब तृष्णा बुझेगी ?
कब कब्र होगी "बस एक और " की तमन्ना ?
पर ये तो मैंने कल भी सोचा था
और शायद कल भी सोचूंगा,