इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

कैसे लौटूं ......


एक सुबह अपनों ने जगाया मुझे,
आशीर्वाद दिया और बोला कि जाना है तुम्हे कुछ करना है..
आँख मलता मैं जाना नहीं चाहता था ...
पापा रोक लो, मम्मी रोक लो , प्रिये मैं नहीं जाना चाहता
पर किसी ने न सुनी .....................
बाहर बहुत रौशनी थी, चश्मा लगा लिया था
लोग चिल्ला रहे थे तो इयर फोन ठूस लिया था कानो में
खाना भी घर जैसा नहीं मिला मुझे
जो मिला उसी में घर का भाव खोजा था मैंने,
पृथक ना हो जाऊ, सो चाल और बोल
दोनों नयी सीख ली थी.....
एक दिन रात को नीद नहीं आ रही थी
घुटन महसूस होने लगी ,
मन भर के रोया ....
हसरत थी कि मम्मी , पापा, प्रिये
काश कमरे के कोने से
चुपके से देख लेती मेरी पीड़ा तुम,
तो समझ जाती कि जिस रवि को
तुने सींचा था अपने भावो से वो वैसा ही है ,
जलता है , कोसता है अपने में हुए भौतिक परिवर्तन को
जिसको तुमने स्थायी समझ लिया है .....

सोमवार, 1 अगस्त 2011

अन्तर्द्वंद

खून से रिश्ता बनता आया
क्यों रिश्तो से न खून बने ?
सम्बन्ध ही जन्मे भावना
क्यों भावनाओ से न सम्बन्ध बने ?

धर्म बनता कर्म है आया
क्यों कर्मो से न धर्म बने ?
माता से बने है भाई मगर
इन जानो में क्यों न भाई बने ?

मैं चाहता हूँ  ....

तोड़ दो सारी कुरीतियाँ 
बनाना है तुम्हे  कुछ नया
करो तुम वो जो "तुम "  ने कहा
सुनो न किसने क्या है कहा ,

मानवता से प्रेरित हो भाव सभी
न मूल्य रहें  कु-धर्मो का कोई
मानव की श्रष्टि  बना डालो
तो  फिर जाग सके दुनिया सोयी ................


 

" जीवन है एक धुप्प अँधेरा "

जीवन है एक धुप्प अँधेरा 
होता जिसका नहीं सवेरा 
हम सब है बस ओस की बूंदे 
इस जीवन के कोहरे में ,

भाग रहे है इधर उधर 
लड़ते एक दूसरे से  
मानो सभी ख़ोज रहे हो 
छुटकारा इस जीवन से ,

आँखे फाड़े देख रहे है 
क्या रखा है सम्मुख में 
फिर भी हम अनजान ही रहे 
इस प्यारे झूठे जीवन से ,

क्या सुख है और क्या दुःख है ?
है सुब कुछ हमसे परिभाषित 
जीवन बस फल है कुकर्मो का 
न की  खुशी असीमित , 

म्रत्यु हो गयी मानो मेरी 
इस जीवन को पा कर के 
रिश्ते-नाते प्रेम-घ्रणा के 
मोह्पास में फस कर के ,

जीवन तो पर्याय है दुःख का 
म्रत्यु अर्थ है सुख का 
जीवन के हर क्षण  से अच्छा 
होगा अंतिम पल इस जीवन का .....................................
 

 




रविवार, 24 जुलाई 2011

प्रेम...........

चाहत है , की यू ही अब 
अकेले जिंदगी गुजर जाये...
ग़र तूम न, तो कोई न अब,
मेरे दरवाजे दस्तक देने आये.......................... 


प्रेम अकथनीय , अकल्पनीय अनुभूति है...प्रेम जीवन का सबसे सुखद अनुभव है , और इस एहसास से दूर भागना या एहसास करते हुए भी अभाव में जीना सबसे दुखद.................




क़ाश आज ऐसा हो जाये.............

क़ाश आज ऐसा हो जाये 
शाम गुजर जाये 
पर सुबह न  आये 
क़ाश आज ऐसा हो जाये,
मन का संशय हट जाये
और नया विश्वाश आ जाये 
कि..समय  यहीं रुक जायेगा
लक्ष्य मुझे मिल जायेगा
क़ाश आज ऐसा हो जाये,
कम्पित मन के
कल्पित भय से
मुक्ति मुझे मिल जाये
क़ाश आज ऐसा हो जाये...
क़ाश आज ऐसा हो जाये........................................  



अनचाही दरार-2........."खूंटा "

प्रेम की बनावट में 
समर्पण  की लकड़ी  के,
दो खूंटे बनाये थे हमने 
एक मैंने तेरे,
और एक तुने मेरे 
सीने में गाड़ा था ...
तेर खूंटा उखड़ न सका,
मेरा खूंटा उखड़ गया ......आधा
जड़ को लिए तू
और तेरे खूंटे को लिए मैं,
अगल बगल की विमुखी  सड़को पर...
एक दुसरे को कोसते 
 खुद की गलतियाँ दूंदते,
खूंटे में रही कमी का एहसास करते 
चले जा रहे है......
चौराहे की तलाश में,
की ताकि सड़क बदल ले 
और हो जाये फिर से हमराही,
लेकिन नहीं आ रहे है ...
चौराहे .... 
 

अनचाही दरार-1

पिछली ऋतू में मैं सूखा था,
अबकी ऋतू न आई
अगली ऋतू के इंतज़ार में ,
आँखे भर भर आई.........

शुक्रवार, 13 मई 2011

Chaahat

कल जब सुबह होगी,
फिर उठूँगा
कुछ नया करुगा 
पर ये तो मैंने कल भी सोचा था
और शायद कल भी सोचूंगा ,
स्खलित नहीं हुई है रूह मेरी 
गहरा समंदरहै उतरने को अभी,
पर ये तो मैंने कल भी सोचा था
और शायद कल भी सोचूंगा,
कब तृप्ति मिलेगी ?
कब तृष्णा बुझेगी ?
कब कब्र होगी "बस एक और " की तमन्ना ?
पर ये तो मैंने कल भी सोचा था
और शायद कल भी सोचूंगा,